Sunday, March 25, 2007

निठारी पर भारी निठल्ली व्यवस्था



Team GNBI
कई हिन्दी फिल्मों में ऐसा होता है कि बड़े विलेन को बचाने के लिए छोटे विलेन या फिर किसी मासूम को बलि का बकरा बना दिया जाता है। कहते है कि फिल्मों की कहानी भी रियल लाइफ से ही प्रेरित होती है। या फिर कभी रियल लाइफ रील लाइफ से सीख लेती है। लगता है निठारी कांड में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। मानवता को शर्मसार करने वाले निठारी कांड में पहले तो समाज के पहरेदार निठल्ले बने रहे और अब क्लाइमेक्स में स्टोरी ही बदल देने पर आमादा हैं। 22 मार्च 2007 को सीबीआई ने प्रेस कॉफ्रेस के जरिए जो बताया उससे तो यही लगता है कि बड़े विलेन को छोड़ छोटे विलेन पर ही गाज गिरने वाली है। सुरेन्द्र कोली कह रहा है कि सारी हत्याएं उसने ही की हैं और उसके मालिक मोनिंदर सिंह को इनकी कोई जानकारी ही नहीं थी। ये सरासर फिल्मी लग रहा है। मानो किसी ने पटकथा लिख दी हो और सुरेंद्र डॉयलॉग की तरह बयान दे रहा है।

क्या ये संभव है कि आपके घर में ही एक नहीं दो नहीं पूरे 19 मासूमों के कत्ल हो जा रहे हैं और आपको भनक तक न लगे। भले ही आप घर से बाहर हों तब भी। मान भी लिया जाए कि सुरेंद्र मानसिक तौर पर विकृत हैं तो क्या मोनिंदर को कभी इसका आभास नहीं हुआ। ये तो समझ से परे है। जिस तरह मोनिंदर सुरेंद्र पर रुपए लुटाता था उससे ये मालिक-नौकर का रिश्ता कम हमराज़ का रिश्ता ज्यादा लगता है। सुरेंद्र उत्तराखंड कि किसी दूर-दराज के गांव का है। जब वो अपने गांव जाता था तो मोनिंदर की गाड़ी उसे छोड़ने जाती थी और गाड़ी ही लेने भी आती थी। क्या हाई-फाई मोनिंदर सिर्फ एक नौकर के लिए ऐसा करता होगा। वैसे भी इतना बड़ा कांड हो जाने पर जिस पुलिस को भनक नहीं लगी या फिर भनक न लगने का नाटक किया गया हो उस पर यकीन करना मुश्किल है। हमारे यहां सच्चाई हर स्तर पर पैसे, सत्ता और रुतबे के नीचे दम तोड़ती रहती है। अगर लोग इतने उग्र नहीं हुए होते तो मुमकिन था कि निठारी कांड भी पुलिस की फाइलों में धूल खा रहा होता। लोगों की सक्रियता की वजह से ही मामला सामने आया और सीबीआई जांच की घोषणा हुई। पर फिर सच्चाई का गला घोंटने की कोशिश हो रही है।

इससे इनकार नहीं किया जा सकता मोनिंदर रुतबे और पहुंच वाला शख्स है। पैसों की उसे कोई कमी नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि मोनिंदर को और उसी कड़ी में और भी सफेदपोशों को बचाने का अभियान चल रहा है।

निठारी कांड के बाद जिस तरह लोगों का गुस्सा फूटा उससे इस मामले को दबाना तो लगभग नामुमकिन हो गया था। इसलिए किसी न किसी को तो सज़ा देनी ही है। ताकि हमारे रखवाले या कहें कानून के रखवाले लोगों के गुस्से को शांत कर सकें कि देखो..हमने तो मुजरिम को खोज निकाला और सज़ा भी दे दी। पर इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि बड़े लोगों को बचाने के लिए सुरेंद्र कोली को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। मतलब ये कतई नहीं है कि सुरेन्द्र कोली बेगुनाह है...ये कहने का बस इतना मकसद है कि सुरेंद्र कोली के साथ बड़े दोषियों पर शिकंजा क्यों नहीं कसा जा रहा है? कोली के साथ बाकियों को सज़ा देने की कोशिश क्यों नहीं हो रही है? क्यों बड़े दरिंदों को बचाया जा रहा है? क्यों मासूमों के सफेदपोश हत्यारों पर मामूली धाराएं लगाई जा रही हैं?

जैसा कि फिल्मों में होता है...मालिक अपने नौकर से कहता है कि मेरे गुनाह भी अपने सर पर ले ले। तुझे तो वैसे भी मरना ही है...मेरे गुनाहों की सज़ा भी तू ही भुगत ले तो मैं तेरे परिवार की लाइफ बना दूंगा...। कहीं रील लाइफ की पटकथा ही रियल लाइफ में तो नहीं चल रही .... सतर्क रहें...

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